देश की मशहूर पंडवानी गायिका पद्म विभूषित डॉ.तीजन बाई का निधन
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने दी श्रद्धांजलि
Samna.in.Chhattisgarh देश की मशहूर पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ.तीजन बाई का लंबी बीमारी के बाद रायपुर के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में निधन हो गया है।तीजन बाई के निधन से छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश के कला और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।

गंभीर रूप से बीमार थीं तीजन बाई
तीजन बाई पिछले कई हफ्तों से गंभीर रूप से बीमार थीं और रायपुर AIIMS में उनका इलाज चल रही था,आज तड़के करीब 3:15 बजे अचानक उनकी सेहत ज्यादा बिगड़ गई, जिसके बाद डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने दी श्रद्धांजलि
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने आज अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), रायपुर पहुंचकर पद्म विभूषण से सम्मानित विश्वविख्यात पंडवानी गायिका डॉ. तीजन बाई के पार्थिव शरीर पर पुष्पचक्र अर्पित कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी। उन्होंने शोकाकुल परिजनों से भेंट कर अपनी संवेदनाएं व्यक्त कीं।
मुख्यमंत्री साय ने कहा कि डॉ. तीजन बाई ने अपनी अद्वितीय कला-साधना और विलक्षण प्रतिभा से उन्होंने पंडवानी को विश्व पटल पर विशिष्ट पहचान दिलाई तथा छत्तीसगढ़ का गौरव बढ़ाया। डॉ. तीजन बाई का निधन छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति एवं सांस्कृतिक विरासत के लिए अपूरणीय क्षति है।
तंबूरे के दम पर जीती दुनियां
1956 में छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के एक छोटे से गांव गनियारी में जन्मी तीजन बाई का पूरा जीवन संघर्ष, साहस और कामयाबी की एक अनोखी दास्तान है. उन्होंने उस दौर में लोक कला ‘पंडवानी’ (महाभारत की पारंपरिक कथा गायन) को अपनाया, जब इस कला पर पूरी तरह पुरुषों का कब्जा माना जाता था।
खासकर पंडवानी की ‘कापालिक शैली’ में कदम रखने के लिए उन्हें भारी सामाजिक विरोध, रूढ़ियों और बंदिशों का सामना करना पड़ा. लेकिन तीजन बाई ने हार नहीं मानी. जब वह हाथ में अपना तंबूरा लेकर, कड़क आवाज और बेजोड़ अभिनय के साथ मंच पर उतरती थीं, तो सामने बैठी भीड़ मंत्रमुग्ध हो जाती थी.
तीजन बाई ने विदेशों में भी लहराया परचम
पिछले पांच दशकों से भी ज्यादा समय से तीजन बाई मंचों पर देश की मिट्टी की खुशबू बिखेर रही थीं. उन्होंने पंडवानी को सिर्फ छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं रखा, बल्कि एशिया से लेकर यूरोप तक, दुनिया के कोने-कोने में इस पारंपरिक विधा का डंका बजाया. उन्होंने तमाम शुरुआती विरोधों के बावजूद न सिर्फ इस लोक परंपरा को जिंदा रखा, बल्कि इसे एक नई पहचान देकर कलाकारों की कई पीढ़ियों को प्रेरित भी किया.



